रिमझिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन….
रजनीगंधा फूल तुम्हारे महकें यूं ही जीवन में….
बड़ी सूनी सूनी है….
जानेमन जानेमन तेरे दो नयन, चोरी चोरी लेके गए देखो मेरा मन….
कहीं दूर जब दिन ढल जाए….. और ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय! …
जैसे कालजयी गीत लिखे हैं गीतकार योगेश Geetkar Yogesh ने । लखनऊ में जन्मे योगेश का पूरा नाम योगेश गौड़ है । हिंदी सिनेमा में महज़ तीन दर्ज़न फ़िल्मों के गीत लिखने वाले योगेश के टीवी धारावाहिकों के शीर्षक गीतों की संख्या ख़ुद उनकी मानें तो कोई दौ सौ के क़रीब है। और, यही वह बड़ा काम हैं, जिसके ज़रिये योगेश ने ख़ूब दाम कमाया। उनको नाम दिलाने वाले गाने तो मैंने इस लेख के शुरू में ही बता दिए।
जब योगेश 16 साल के थे वह अपने पिता के निधन के बाद बंबई (अब मुंबई) आ गए थे, नौकरी की तलाश में। उनके एक चचेरे भाई ब्रजेंद्र गौड़ का तब तक इस शहर में नाम हो चुका था। ब्रजेंद्र पटकथा लेखक थे और उन दिनों उनका नाम लोग अच्छे से पहचानते थे लेकिन, जैसा कि इस शहर में अक्सर होता ही है, दूर दराज़ की तो छोड़िए, अपने भी इस शहर में काम धंधे की तलाश में आने वालों से मुंह मोड़ लेते हैं।
योगेश ने मायानगरी में ख़ूब संघर्ष किया। छोटे मोटे काम किए। जूनियर आर्टिस्ट सप्लाई करने वाले एक शख़्स ने एक दिन दो वक़्त खाना दिलाने के बदले उन्हें एक पौराणिक फ़िल्म ‘चक्रधारी’ की भीड़ में खड़े होने का मौक़ा दे दिया। कुछ पैसे भी हाथ आए और इस तरह योगेश गौड़ का फ़िल्मों में डेब्यू हुआ।
योगेश गौड़ अपने रिश्तेदार से मिली बेरूख़ी से इतना दुखी हुए कि उन्होंने इसके बाद अपना सरनेम ही लिखना छोड़ दिया, वह इसलिए कि कहीं उन पर गौड़ सरनेम का फ़ायदा उठाने की तोहमत न लग जाए। हालांकि, योगेश ने जब बंबई की धरती पर क़दम रखा तो फ़िल्मों मे काम करना उनके सपने में भी शुमार न था, वह तो इस शहर में कुछ भी कर लेने का हौसला लेकर पहुंचे थे।
गीतकार योगेश Geetkar Yogesh को बतौर गीतकार पहला ब्रेक मिला साल 1962 में, जब उन्हें फ़िल्म सखी रॉबिन के गीत लिखने का मौक़ा मिला। फ़िल्म के संगीतकार रॉबिन मुखर्जी से उनकी अनायास मुलाक़ात हो गई और वह रोज़ उनके साथ उनकी संगीत संगत में बैठने लगे। रॉबिन अपनी धुनें बजाते और योगेश उन्हें बस ध्यान से सुनते रहते। एक दिन यूं ही योगेश ने अपने इस नए नए बने दोस्त से आवाज़ टेढ़ी करके पूछ ही लिया, आप मुझे रोज़ ये धुनें तो सुनाते हैं, लेकिन काम क्यों नहीं देते?
अब बरसने की बारी रॉबिन मुखर्जी की थी। उन्होंने छूटते ही कहा, “अब क्या मैं लिखकर दूं तुम्हें। महीने भर से तो धुनें सुना रहा हूं, पर तुम हो कि कुछ लिखकर ही नहीं लाते। रोज़ बस चले आते हो ख़ाली हाथ!
गीतकार योगेश Geetkar Yogesh को हिंदी फ़िल्म जगत में मिला ये पहला सबक़ था। उन्हें समझ आया कि अधिकतर संगीतकार ऐसे ही काम करते हैं। लिखने वालों को धुनें सुनाते हैं और सुनने के बाद लिखने वाले गीत लिख लाते हैं। आधा काम धुनें करती हैं और बाक़ी आधा काम गीतकार को करना होता है।
ये फ़िल्म अगले साल 1963 में रिलीज़ हुई और पहली बार लोगों का ध्यान उनकी तरफ़ गया। इस फ़िल्म के लिए मन्ना डे के गाए गीत ‘तुम जो आओ तो प्यार आ जाए…’ की चर्चा हर ओर होने लगी। सखी रॉबिन के संगीत का हिट होना इसके संगीतकार रॉबिन मुखर्जी के लिए वरदान बनकर आया। उन्हें छोटे बजट की कोई दर्ज़न भर फ़िल्मों के प्रस्ताव आए और उन्होंने दो-तीन को छोड़कर बाक़ी फ़िल्में साइन भी कर लीं।
गीतकार योगेश Geetkar Yogesh का असल टैलेंट उन दिनों समझ आया संगीतकार उषा खन्ना को, जिन्होंने उन्हें फ़िल्म एक रात (1967) में योगेश को मौका दिया और उनका लिखा ये गाना, उस दौर का सबसे सुपरहिट गाना बना, आवाज़ थी मोहम्मद रफ़ी की..
सौ बार बनाकर मालिक ने
सौ बार मिटाया होगा
ये हुस्न मुजस्सिम तब तेरा
इस रंग पे आया होगा
साल 1959 में मुंबई आने के बाद योगेश ने दो वक़्त की रोटी कमाने के लिए यहां वहां जो काम मिला वह किया। इस दौरान वह झोपड़पट्टी में रहे। चॉल में रहे। ख़ुद खाना बनाते खाते रहे, लेकिन कभी अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया और न ही किसी के आगे उन्होंने हाथ फैलाया। हां, इस दौरान उनके एक मित्र सत्यप्रकाश ने उनकी काफ़ी मदद की।
योगेश को बचपन से ही पढ़ने लिखने का बड़ा शौक़ था। स्कूल के दिनों से ही वह कविताएं बुनने लगे थे जो उनकी मां को बहुत पसंद आती थी। अपनी मां को एक दिन सपने में देखने के बाद योगेश ने लेखन पर ही फ़ोकस करने का फ़ैसला किया।
वह ख़ुद को फ़िल्मों में कहानी, पटकथा और गाने, माने लिखने से जुड़ा कोई भी काम करने के लिए तैयार करने लगे। उनको दूसरे कवियों की कविताएं याद भी बहुत जल्दी हो जाती थीं। एक बार उनसे जब उनका पसंदीदा गीत पूछा गया तो उन्होंने फ़िल्म आलाप (1977) में हरिवंश राय बच्चन के लिखे गीत कोई गाता मैं सो जाता को अपना पसंदीदा गीत बताया था।
गीतकार योगेश Geetkar Yogesh के गीत प्रचलन में आ चुके थे, उनकी तारीफ़ भी हो रही थी, लेकिन ये गाने वह सुने कैसे? तो इसके लिए वह जाने लगे सविता चौधरी के घर। सविता चौधरी ही योगेश की इकलौती परिचित थीं, जिनके घर उन दिनों ग्रामोफ़ोन हुआ करता था। ये वही दौर था जब सलिल चौधरी ‘सारा आकाश’ (1969) का संगीत देने के बाद फिर से हिंदी सिनेमा में कुछ धमाकेदार रचना चाह रहे थे।
सविता ने योगेश का ज़िक्र सलिल चौधरी से किया और दोनों के साथ ने फ़िल्म आनंद में जो रंग जमाया, वह आज तक फीका नहीं पड़ा है। इस फ़िल्म के गाने रिलीज़ होने के बाद तो योगेश की गाड़ी दौड़ पड़ी लेकिन, उनको उस दौर में मुक़ाबला करना होता था, आनंद बक्षी, मजरूह सुल्तानपुरी, गुलशन बावरा और गुलज़ार जैसी नामचीन शख़्सियतों से।
ऋषिकेश मुखर्जी और योगेश की जोड़ी भी ख़ूब जमी। दोनों ने एक साथ कई फ़िल्मों में काम भी किया और इसी दौरान योगेश के गाने सुनकर निर्देशक बासु चटर्जी ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया और योगेश को मौक़ा मिला फ़िल्म उस पार और ‘रजनीगंधा’ के गीत लिखने का। कम लोग ही जानते होंगे कि किशोर कुमार की फ़िल्म ‘प्यार अजनबी है’ के गानों के अलावा इसकी कथा-पटकथा भी योगेश की ही लिखी हुई है।
योगेश
(19 मार्च, 1943 – 29 मई, 2020)

